END of VIP culture

अब भारत में वीआईपी कल्चर ख़त्म हो जाएगा, ऐसा कहा जा रहा है हाल के केंद्रीय सरकार के एक निर्णय के बाद. इसके मुताबिक अब राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अलावा और कोई अपनी गाड़ी पर लाल, नीली या पीली बत्ती नहीं लगा सकेगा.

इस कदम की चौतरफा तारीफ़ हो रही है. क्यों न हो? वीआईपी जिस तरह भारत की सभी भाषाओं का अपना शब्द बन गया था , उसी से समझा जा सकता है कि उसकी जकड़ भारतीय सामाजिक दिमाग पर कितनी ज़बरदस्त होगी!गांव हो या शहर, पढ़ लिखकर अगर बेटे ने द्वार पर लाल बत्ती वाली गाड़ी न लगवाई तो फिर सारा कुछ अकारथ समझो!

लेकिन वीआईपी कल्चर ख़त्म करना ही है तो फिर ऊपर की सूची का अपवाद क्यों! बराबरी या तो एकबारगी और पूरी होती है या नहीं होती. दूसरा प्रश्न यह उठ सकता है कि संघीय ढांचे वाले मुल्क में केंद्रीय सरकार की कैबिनेट सारे राज्यों के बारे में क्यों निर्णय ले रही है. क्या यह सच नहीं कि इसके पहले दिल्ली और पंजाब की सरकारें ऐसा निर्णय कर चुकी हैं? फिर राज्यों का मामला उनके हाथ या उनके विवेक पर क्यों न छोड़ा गया?

वीआईपी शब्द अंग्रेज़ी का है जो आधुनिक शिक्षा और ज्ञान से जुड़ी है, लेकिन इसकी संस्कृति का एक सिरा सामंती दिमाग से जुड़ता है. समाज में कुछ लोग मात्र सांकेतिक नहीं वास्तविक रूप में भी सुविधाप्राप्त और विशेषाधिकारयुक्त होंगे, यह मान कर चला जाता है. साधारण जन और विशिष्ट जन की श्रेणियां बंटी हुई हैं और उनपर सवाल नहीं उठा सकते. विशिष्टता आप ओहदे से हासिल कर सकते हैं या धन के बल पर!

कहा जाता है कि ईश्वर के आगे सब बराबर हैं , क्या राजा क्या रंक! लेकिन हमारे यहां ईश्वर के स्वनियुक्त प्रतिनिधि ऐसा नहीं मानते. कामख्या देवी हों या पुरी के जगन्नाथ, अगर आप ओहदेदार हैं या पैसे वाले हैं तो देवी या भगवान् के दर्शन आपको बिना पसीने के और कुर्ता कुचलवाए मिल सकेंगे. लेकिन अगर आप बदनसीब हैं तो फिर इन खुदा के बंदों को अध्यात्म लाभ करके सरसराती लाल बत्ती वाली गाड़ी में अपने आगे से निकल जाते देखते रह जाएंगे और अपने भाग्य को कोसते.

इस सामंती संस्कृति के दर्शन आपको सबसे ज्यादा इंसाफ की तलाश में जिन गलियारों में आप भटकते हैं, वहां होते हैं. जज साहबान की पदचाप आते ही कानफोड़ू सन्नाटा छा जाता है. गलियारों में खड़े लोग बुत की तरह या तो तो जम जाते हैं या कई कोर्निश के अंदाज में झुक जाते हैं. इंसाफ की बुनियाद बराबरी है लेकिन क्या हमारे न्यायमूर्ति खुद अपने कई विशेषाधिकार छोड़ने को तैयार होंगे!

वीआईपी संस्कृति का अर्थ है विशेषाधिकार और छूट. सड़क पर आपको पहले निकलने का रास्ता दिया जाएगा और दुनियावी कानूनों से भी आप आज़ाद होंगे. भारतीय जनतंत्र की विडम्बना यह है कि यह आजादी सबसे पहले खुद जन प्रतिनिधियों ने ले ली. अभी हाल में एक सांसद ने एक एयरलाइंस कंपनी के कर्मचारी पर सरेआम हमला किया लेकिन संसद ने अपने सदस्य को यों वापस लिया मानो किसी बच्चे ने कोई चूक की हो. बल्कि चूक का जिक्र भी कहां! और लोकसभा की अध्यक्ष जो भगवंत मान के संसद की सिर्फ तस्वीर ले लेने और उनके मदिरापान से इतनी क्षुब्ध थीं, इस मसले पर लगभग खामोश बनी रहीं! मजबूत दीखने वाली सरकार जो पत्थर फेंकने वाले बच्चों को मार डालने का अधिकार चाहती है, इस मामले पर अपने सहयोगी दल की धमकी का कोई जवाब न दे पाई. और एयर लाइंस कंपनियां, जो मामूली यात्रियों को कभी माफ़ न करें, फौरन झुक गईं.

कहा जाता है कि ईश्वर के आगे सब बराबर हैं , क्या राजा क्या रंक! लेकिन हमारे यहां ईश्वर के स्वनियुक्त प्रतिनिधि ऐसा नहीं मानते

लेकिन विशेषाधिकार और भी किस्मों के होते हैं. पटना के करीब दानापुर में फौज की छावनी है. उससे लगती सड़क पर जो कि सार्वजनिक है और फौज का उसपर कोई अधिकार नहीं, फौज का अनकहा नियंत्रण है. उसपर किस रफ़्तार से गाड़ियां चलेंगी, वह तय करती है और उसने ट्रैफिक पुलिस का काम भी अपने हाथ ले लिया है. अगर आप सोच रहे हैं कर्तव्यवश तो ऐसा नहीं है, यह सिर्फ अपनी जागीर का दायरा बढ़ाने का एक तरीका है.

जिस समय लाल बत्ती बुझाने का फरमान सरकार की ओर से जारी हुआ, उसी के आसपास उसने सबसे बड़ी अदालत में एक अर्जी लगाई. उसने कहा कि अदालत ने मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ों में फौज की भूमिका को लेकर जांच वाला जो फैसला दिया है, उसे वापस ले लिया जाए. सेना अपना काम करे और उसमें उसे रुकावट न हो, इससे किसे उज्र होगा. लेकिन वह नागरिकों को मारने की छूट ले ले, यह कैसे कबूल किया जा सकता है!

आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट के तहत फौज ऐसी ही छूट चाहती है. अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने उच्चतम न्यायालय को कहा है कि वह हिमांशु कुमार और सोनी सोरी की दो याचिकाएं खारिज कर दे और उन पर जुर्माना भी लगाए. सोनी सोरी की याचिका उनके साथ पुलिस के दुराचार के खिलाफ है. हिमांशु कुमार ने 2009 में छत्तीसगढ़ के गोमपाड़ा गांव में 16 आदिवासियों की पुलिस द्वारा हत्या के मामले में अर्जी लगाई थी. क्यों राज्य सरकार चाहती है कि एक औरत और आदिवासियों के अधिकार के ऊपर उसकी पुलिस का अधिकार हो! राज्य अपने निवासियों से अधिक हक चाहता है, क्यों?

विशेषाधिकार हमारे समाज के ढांचे में बुना हुआ है. पूंजी का विशेषाधिकार श्रमिक के मुकाबले और राज्य उसकी हिफाजत करने को मुस्तैद, यह वैसे ही स्वाभाविक माना जाता है जैसे पहले राजा का प्रजा पर विशेषाधिकार स्वीकार किया जाता था. पूंजी की यह सत्ता लाल बत्ती की मोहताज नहीं.

जनतंत्र की खासियत यह है कि यह क़ानून के राज के सहारे ही चल सकता है. क़ानून वह जिसके आगे सब बराबर हों! लेकिन अगर गुजरात में मुसलमानों पर हमले और उनके क़त्ल के लिए गुनाहगार और सजा भुगत रही पूर्व मंत्री को तीन साल तक जेल से बाहर रहने की छूट मिले और याकूब मेमन को 20 साल तक सज़ा के इंतजार के दौरान एक दिन की पैरोल भी न मिले तो संदेश बहुत साफ़ है: कुछ के पास कुछ ख़ास वजहों से विशेषाधिकार हैं और कुछ के पास उसी वजह से नहीं.

अगर एक तरफ विशेषाधिकारों को मजबूत करते जाने से आंख मूंद लें तो लाल बत्ती के गाड़ियों पर न रहने को ही हम गनीमत मानने लगेंगे. यह भी ख़याल रहे कि जब हुक्मरान जनता का जाप बहुत करने लगें तो जनता के बुरे दिन आने वाले हैं. हर अधिनायकवाद जनता के अनुचर के रूप में उस पर कब्जा करता है.

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