CONGRESS free INDIA?

जून 2013 में सोलहवें लोकसभा चुनाव की ‘कैंपेन कमेटी’ के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के बाद नरेंद्र मोदी ने अपना आदर्श-वाक्य घोषित किया था- ‘कांग्रेस-मुक्त भारत का निर्माण’. अब जब केरल और असम में कांग्रेस हार कर कर्नाटक और छह छोटे राज्यों में सिमट गयी है, पुन: ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के मोदी-शाह सहित अन्य कई भाजपाइयों के स्वर हवा में लहरा रहे हैं.

 

पिछले तीन वर्ष से कांग्रेस लगातार सिमटती जा रही है. मई 2014 में कांग्रेस की सरकार ग्यारह राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, असम, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, केरल और मिजोरम) में थी और दो राज्यों (झारखंड और जम्मू-कश्मीर) में वह सहयोगी कनिष्ठ रूप में थी. अब उसकी संख्या लगभग आधी कम है. 

 

भाजपा की सरकार पैंतीस प्रतिशत जनसंख्या वाले राज्यों में हैं. राजग के साथ उसकी सरकार में तैंतालीस प्रतिशत जनसंख्या वाले राज्य हैं. कांग्रेस मात्र सात प्रतिशत आबादी के राज्यों में है. कनिष्ठ सहयोगी दल के कुल पंद्रह प्रतिशत जनसंख्या पर इसका शासन है. 2013 से ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का मोदी-अभियान फिलहाल चरम पर है. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा की जीत हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू-कश्मीर और असम में हुई है. अच्छे वोट प्रतिशत से भाजपा (एक सीट ही सही) केरल में प्रवेश कर चुकी है. 

 

कांग्रेस-मुक्त भारत की चाह और मांग एक उत्तर-आधुनिक चाह और मांग है. क्या ‘अच्छे दिन’ का संबंध ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ से है? इस ‘स्लोगन’ के गूढ़ाशयों, अभिप्रायों और संकेतार्थों को भी समझना चाहिए. आवश्यक नहीं है कि हम विंटगेस्टाइन के ‘लैंग्वेज गेम थ्योरी’ और नोम चोम्स्की की भाषा की राजनीति (लैंग्वेज ऑफ पॉलिटिक्स, 1988) पर विचार करें, पर ‘प्रोपैगेंडा’ की सेवा में भाषा का जो इस्तेमाल किया जाता है, उसे अवश्य देखा जाना चाहिए. भाषिक संरचना और व्यवहार, सामाजिक संरचना और व्यवहार से सर्वथा अलग नहीं होते. 

 

वे हमारी मानसिक संरचना को भी प्रभावित करते हैं. मोदी की भाषा की आक्रामकता आक्रामक पूंजी से विच्छिन्न नहीं है. लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद से मोदी के कांग्रेस-मुक्त भारत तक की यात्रा सम-विषम मार्गों से जुड़ी है. पहली बार लोहिया ने ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का नारा दिया. बीस वर्ष बाद मधु लिमये की पुस्तक आयी- ‘बर्थ ऑफ नॉन-कांग्रेसिज्म: अपोजिशन पॉलिटिक्स 1947-1975’ (1988). नेहरू के निधन के बाद चौथे लोकसभा चुनाव से जो कांग्रेस-विरोधी लहर शुरू हुई, उसके कई चरण हैं.

 

‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ की चाह और मांग कांग्रेस की विचारधारा और नेहरू की विचारधारा से मुक्त होने की मांग है. इस मांग को मात्र एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल से ही जोड़ कर नहीं देखा जा सकता. क्या मनमोहन सिंह ने भारत को कांग्रेस-मुक्त करने में (कांग्रेस और नेहरू की विचारधारा से) कोई भूमिका नहीं अदा की? ‘आधुनिक भारत की अवधारणा’ को उन्होंने अर्थनीतियों (नव उदारवादी अर्थव्यवस्था) से खंडित किया. यह गहरे शोध का विषय है कि स्वयं कांग्रेस ने 1991 से आज के मोदी की कांग्रेस-मुक्त भारत की परियोजना में कितनी बड़ी भूमिका अदा की. 

 

वित्त मंत्री बनने से पहले मनमोहन सिंह गैर-राजनीतिक थे. वित्त मंत्री बनने के बाद वे कांग्रेस से जुड़े. कांग्रेसी विचारधारा से उनका कोई संबंध-सरोकार नहीं था. कांग्रेस को, कांग्रेसी विचारधारा और नेहरूवियन मॉडल को कांग्रेस ने ही क्षतिग्रस्त किया. अब जब भारतीय समाज उपभोक्ता समाज बन गया है, भारतीय संस्कृति उपभोक्ता संस्कृति हो चुकी है, कॉरपोरेट राज्य ‘राष्ट्र राज्य’ की तुलना में प्रभावकारी हो रहा है, तब भारत को कांग्रेस-मुक्त होना ही है. 

 

यहां ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के खतरे भी हैं. कांग्रेस-मुक्त भारत की मोदी-परियोजना हमें स्मृति, तर्क, विवेक और इतिहास से मुक्त करने के लिए भी है. नेहरू और मनमोहन सिंह में जितना अंतर है, उतनी ही नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह में समीपता है. 

 

प्रश्न राजनीतिक पार्टी का ही नहीं, नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के सहचर होने का है, जो कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से औद्योगिक पूंजीवाद के दौर में जन्मे-विकसित हुए थे. कॉरपोरेट भारत में नेहरूवियन मॉडलों और कांग्रेस के पुराने विचारों से, राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी स्मृतियों, आधुनिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों, धर्मनिरपेक्षता के लिए कोई जगह नहीं है. ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का अर्थ इन सबसे मुक्त होने में है, जिससे संवैधानिक लोकतंत्र का ढांचा कमजोर हो और कॉरपोरेट भारत शक्तिशाली हो.

CREDIT:

रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार
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