Harish Rawat’s Win : Wrong use of president’s rule in Uttrakhand?

18 मार्च से मई आ गया, लेकिन उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने की तमाम दलीलों से बीजेपी पीछे नहीं हटी। जिन नौ विधायकों के दम पर उसने दलील दी कि सरकार अल्पमत में आ गई है, उनकी सदस्यता तक चली गई। कोर्ट में 9 विधायक अपने आपको साबित नहीं कर पाए। कांग्रेस के ज़माने में राष्ट्रपति शासन के दुरुपयोग का विरोध करते रहने वाली बीजेपी इस बार ख़ुद फंस गई। मोदी सरकार ने जितनी भी दलीलें और धाराओं का सहारा लिया, कोर्ट में कुछ नहीं टिका। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बीजेपी इस मामले में लगातार हारते चली गई। सदन में जब विश्वासमत हुआ उसमें भी हार गई। विश्वास मत सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में कराया, यहां तक कि जब तक कोर्ट के भीतर लिफाफा नहीं खुला नतीजे के बारे में दावे तो किये जाते रहे, मगर उनकी कोई मान्यता नहीं थी। लिफाफा खुलते ही देहरादून में कांग्रेस खेमे में उत्साह बढ़ गया। हरीश रावत के पक्ष में 33 मत पड़े और बीजेपी के पक्ष में 28।

हरीश रावत को फिर से शपथ लेने की ज़रूरत नहीं है। अदालत का आदेश आते ही केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हुई और राष्ट्रपति शासन हटाने का फ़ैसला कर लिया गया। बीजेपी ने संवैधानिकता, नैतिकता और भ्रष्टाचार के आरोपों के दम पर राष्ट्रपति शासन को हर स्तर पर जायज़ ठहराने का प्रयास किया लेकिन सहयोगी संघवाद का नारा देने वाली बीजेपी अदालत में अपनी बात साबित नहीं कर पाई। एक महीने से ज्यादा समय तक एक चुनी हुई सरकार को बर्खास्त तक कई स्तरों पर सार्वजनिक बहसों के ज़रिये वक्त भी बर्बाद हुई। दो-दो बार स्टिंग ऑपरेशन का मामला सामने आया, जिसमें रावत पर पैसे से सरकार बचाने के प्रयास का आरोप भी लगा। स्टिंग ऑपरेशन से जो सवाल उठे और राष्ट्रपति शासन लगाने को लेकर जो सवाल उठ रहे थे, दोनों का कोई संबंध नहीं था। लेकिन बीजेपी स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये राष्ट्रपति शासन का बचाव करने का हरसंभव प्रयास करती रही। मशहूर वकील हरीश साल्वे ने जब स्टिंग ऑपरेशन का हवाला दिया तो उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अगर राष्ट्रपति भ्रष्टाचार के आरोपों के आधार पर राज्यों में अपना शासन थोपने लगेंगे तो कोई राज्य सरकार पांच मिनट से ज्यादा नहीं चल पाएगी। बहरहाल स्टिंग ऑपरेशन के मामले की सीबीआई जांच भी करने लगी है।

1994 में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने एस आर बोम्मई केस में फैसला दिया कि अतिविशिष्ट परिस्थिति में ही राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल होना चाहिए। केंद्र सरकार के राजनीतिक हित के लिए कभी नहीं होना चाहिए। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महीने भर से कम समय में सुनवाई कर फैसला दिया। अपने आप में इतिहास है। वो भी पुरानी सरकार के रहते फैसला दिया है। ऐसा नहीं कि दूसरी सरकार बन गई या चुनाव होकर कोई और सरकार आ गई फिर फैसला आया।

इस साल 26 जनवरी के दिन अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। कांग्रेस ने इसे भी चुनौती दी मगर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में सुनवाई चलती रही और अरुणाचल प्रदेश में नई सरकार बन गई। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी तक नहीं आया है।

हरीश रावत के लिए ये एक ऐसी सियासी लड़ाई साबित हुई जिसमें उन्होंने एक ही वार में मोदी सरकार की कोशिशों और पार्टी में अपने सियासी विरोधियों को चित कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत के साथ नौ विधायक ना इधर के रहे, ना उधर के। कांग्रेस के इन बाग़ियों के आधार पर ही बीजेपी ने राज्य में हरीश रावत सरकार को पटखनी देने की योजना बनाई थी। बाग़ियों ने हरीश रावत सरकार को बर्ख़ास्त करने के लिए राज्यपाल को दिए ख़त में बीजेपी के लेटर पैड पर हस्ताक्षर किए। वो बीजेपी के नेताओं के साथ विमान से देहरादून से दिल्ली पहुंचे और बीजेपी के नेताओं के साथ बसों में कभी गुड़गांव तो कभी जयपुर में घूमते रहे। फाइव स्टार होटलों में ठहरे। दिल्ली में हरीश रावत के ख़िलाफ़ स्टिंग जारी कर उन पर भ्रष्टाचार का आरोप भी लगाया, लेकिन कुछ काम नहीं आया। विधानसभा में भी हार का मुंह देखना पड़ा और उत्तराखंड हाइकोर्ट में भी। उत्तराखंड हाइकोर्ट ने इन बाग़ियों की याचिका खारिज कर उनकी विधायकी रद्द करने के स्पीकर के फ़ैसले पर मुहर लगा दी। हाइकोर्ट ने कहा कि उन विधायकों ने अपने काम से ख़ुद ही राजनीतिक दल से अपनी सदस्यता छोड़ देने का काम किया है। अब इन बाग़ियों के सामने विकल्प बहुत ही कम बचे हैं। कई के सियासी करियर संकट में पड़ गए हैं। ना कांग्रेस में वापसी करते बनता है, ना बीजेपी में शामिल होते। हरीश रावत की जीत के बाद बीजेपी के लिए भी उनकी कोई ख़ास अहमियत नहीं रह गई है।

18 मार्च से 11 मई आ गया। उत्तराखंड जहां से चला था वहीं पहुंच गया। इस उत्तराखंड के कारण इतना समय गया कि समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन एक दिन राज्य सभा में झुंझला गईं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के कारण कई ज़रूरी मसलों पर चर्चा नहीं हो रही है।

Ravish kumar NDTV …

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