BOFORS SCAM of Rajiv Gandhi

वर्ष 1987 में बोफोर्स घोटालाः

स्वीडिश हथियार निर्माता बोफोर्स पर 155 मिमी तोपों का सौदा हासिल करने के लिए रिश्वत देने का आरोप लगाया गया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी इस घोटाले में शामिल थे. 21 वर्षों के बाद वर्ष 2011 में इस केस को बंद कर दिया गया. यह सौदा पुराने तोपों और भारतीय सेना के उपलब्ध तोपखानों को बदलने के लिए भारत सरकार और स्वीडन के धातु एवं आयुद्ध निर्माता के बीच किया गया था. भारत सरकार ने कैलिबर 155 मिमी के तोपों को शामिल करने का फैसला किया था. स्वीडन के एबी बोफोर्स अल्फ्रेड नोबेल प्रथम द्वारा रखने वाले एफएच–77 बंदूक के निर्माता हैं.

 

बोफोर्स तोप हो या फिर ऑगस्टा वेस्टलैंड के वीवीआईपी हेलिकॉप्टर, खरीदे गए उत्पाद की गुणवत्ता पर कभी सवाल नहीं उठा है. ये बात जगजाहिर है कि किस तरह बोफोर्स तोप ने अपना लोहा 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान और फिर एक बार ऑपरेशन पराक्रम के समय दुश्मन को कमजोर करने में साबित किया है. इस तोप ने भारतीय थल सेना की मारक क्षमता में कई गुना इजाफा किया था और इसका जवाब देने के लिए दुश्मन के पास कोई विकल्प नहीं था. ऐसी गुणवत्ता वाली तोप देश की सुरक्षा के लिए अहम थी लिहाजा इस डील के पक्ष में फैसला करने में यदि किसी तरह की दलाली स्वीडिश कंपनी ने दी तो सवाल उठना लाजमी है. वह इसलिए कि जब डील पर हामी भरने वालों के पास इस तोप से बेहतर कोई विकल्प नहीं था तो फिर खरीदारी में स्वीडिश कंपनी को इतने पैसे क्यों दिए गए कि खुश होकर कंपनी ने वापस एक बड़ी रकम कमीशन के तौर पर दे दी. क्या देश के हित में इस कमीशन को दरकिनार कर खरीदी गई तोप की कीमत नहीं कम कराई जा सकती थी.?

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