Best Article: Augusta Westland Scandal

This article is by AAJTAK…

 

भारत में भ्रष्टाचार और घूसखोरी को लेकर एक कहावत है- अमेरिका और यूरोपीय देशों में सरकारी कर्मचारी को उसका काम करने से रोकने के लिए घूस दी जाती है, लेकिन भारत में कर्मचारियों को उनका काम करने के लिए घूस दी जाती है.

रक्षा क्षेत्र में बीते दो दशकों की खरीददारी को देखकर तो ऐसा ही लगता है. बोफोर्स मामला 1998 में रोशनी में आया जब देश में सत्ता संभाल रहे लोगों पर आरोप लगा कि स्वीडन की एक कंपनी से 410 हॉविट्जर तोप खरीदने में दलाली ली गई. दो दशकों तक चले इस विवाद से हमने कुछ नहीं सीखा. इसके बाद रक्षा क्षेत्र की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी डील में दलाली का कोई न कोई मामला सामने आ ही जाता है. अब नया मामला वीवीआईपी हेलिकॉप्टर का है. इटली की फिनमेकेनिका कंपनी से 2010 में 12 वीवीआईपी हेलिकॉप्टर की खरीद में एक बार फिर भारतीय अधिकारियों और नेताओं पर उंगली उठ रही है.

पहले बोफोर्स अब ऑगेस्टा हेलिकॉप्टर में दलाली

वीवीआईपी हेलिकॉप्टर ऑगस्टा वेस्टलैंड AW109 की खरीद में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर फिनमैकेनिका कंपनी से किकबैक लेने का आरोप लग रहा है. जिस समय यह डील हुई थी उस वक्त केन्द्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी. ऑगस्टा डील में किकबैक लेने का मामला इटली की एक अदालत के फैसले से उजागर हुआ. कोर्ट ने पाया कि फिनमैकेनिका कंपनी ने डील करने के लिए भारत में अधिकारियों और नेताओं को किकबैक दी है. मामला उजागर होने के बाद तत्कालीन केन्द्र सरकार ने सीबीआई जांच बैठाते हुए डील को रोक दिया.

याद रहे बोफोर्स तोप में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर दलाली लेने का आरोप लगा था. इस मामले में स्वीडन की कंपनी से थल सेना को मजबूत करने के लिए 410 हॉविट्जर तोप खरीदी गई थी. इस डील को करने के लिए भी स्वीडिश कंपनी बोफोर्स पर आरोप था कि उसने सत्ता के गलियारे में सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों समेत सेना के अधिकारियों को अपने पक्ष में फैसला करने के लिए किकबैक का मसौदा रखा था.

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ऑगस्टा वेस्टलैंड AW 109 का इंटीरियर

दलाली क्यों जब खरीदे गए सामान की क्वालिटी उतकृष्ट थी?

दोनों ही मामलों में, चाहे बोफोर्स तोप हो या फिर ऑगस्टा वेस्टलैंड के वीवीआईपी हेलिकॉप्टर, खरीदे गए उत्पाद की गुणवत्ता पर कभी सवाल नहीं उठा है. ये बात जगजाहिर है कि किस तरह बोफोर्स तोप ने अपना लोहा 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान और फिर एक बार ऑपरेशन पराक्रम के समय दुश्मन को कमजोर करने में साबित किया है. इस तोप ने भारतीय थल सेना की मारक क्षमता में कई गुना इजाफा किया था और इसका जवाब देने के लिए दुश्मन के पास कोई विकल्प नहीं था. ऐसी गुणवत्ता वाली तोप देश की सुरक्षा के लिए अहम थी लिहाजा इस डील के पक्ष में फैसला करने में यदि किसी तरह की दलाली स्वीडिश कंपनी ने दी तो सवाल उठना लाजमी है. वह इसलिए कि जब डील पर हामी भरने वालों के पास इस तोप से बेहतर कोई विकल्प नहीं था तो फिर खरीदारी में स्वीडिश कंपनी को इतने पैसे क्यों दिए गए कि खुश होकर कंपनी ने वापस एक बड़ी रकम कमीशन के तौर पर दे दी. क्या देश के हित में इस कमीशन को दरकिनार कर खरीदी गई तोप की कीमत नहीं कम कराई जा सकती थी.?

ठीक इसी तरह देश में वीवीआईपी हेलिकॉप्टर समय की जरूरत थी. देश में कई वीवीआईपी हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो चुके थे और इस्तेमाल किए जा रहे तत्कालीन हेलिकॉप्टर से वीवीआईपी सुरक्षा पर सवाल खड़ा हो रहा था. ऐसे में सरकार ने अपनी जरूरत के मुताबिक दुनिया की सभी बड़ी कंपनियों से उनके हेलिकॉप्टर का ब्यौरा मांगा. इस काम के लिए दुनियाभर में इस्तेमाल किए जा रहे हेलिकॉप्टर का सघन अध्ययन करने के बाद तीन हेलिकॉप्टर देश की जरूरत को पूरा करने के उपयुक्त पाए गए. लिहाजा, इन तीनों हेलिकॉप्टर में सबसे उतकृष्ट हेलीकॉप्टर ऑगस्टा वेस्टलैंड AW109 का चयन कर लिया गया. इटली की इस कंपनी से 3600 करोड़ रुपये में 12 हेलिकॉप्टर खरीदने की डील को स्वीकृति दे दी गई. खरीदे गए हेलिकॉप्टर की पूरी खेप भारत पहुंच भी नहीं पाई थी कि कंपनी पर आरोप लगा कि उसने लगभग 330 करोड़ रुपये भारतीय अधिकारियों और नेताओं को बतौर किकबैक दिया है. लिहाजा साफ है कि भारत से 3600 करोड़ रुपये के भुगतान में कंपनी ने 12 हेलिकॉप्टर के साथ-साथ 330 करोड़ रुपये घूस मे वापस कर दिए. एक बार फिर वही बोफोर्स डील जैसा माजरा. क्या इस 330 करोड़ रुपये का इस्तेमाल कंपनी से 13वां हेलिकॉप्टर खरीदने में नहीं किया जा सकता था?

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कारगिल युद्ध के दौरान बोफोर्स तोप

कैसे होती है रक्षा सौदों की खरीदारी

आखिर बार-बार ऐसा क्यों होता है कि रक्षा सौदों में दलाली का आरोप लग जाता है. ये समझने के लिए जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रक्षा सामग्री के खरीदारी का पूरा तरीका समझा जाए. आज की तारीख में भारत दुनिया में रक्षा सामग्री का चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा खऱीदार है. रक्षा सामग्री का उत्पादन यूरोप, अमेरिका और रूस में होता है और दुनिया के सभी देश इन्हीं देशों से ही अपनी जरूरत का सामान खरीदते हैं. गौरतलब है कि इन सभी देशों में रक्षा सामग्री का उत्पादन आमतौर पर निजी क्षेत्र में किया जाता है. इसी निजी क्षेत्र से इन देशों की सरकार पहले अपनी जरूरत की खरीदारी कर लेती है और फिर वह कंपनी को उस उत्पाद को दुनिया के अन्य देशों को बेचने की इजाजत दे देती है. इन कंपनी के पास ग्राहक के तौर पर दुनियाभर के देश हैं जिसमें लोकतांत्रिक और तानाशाह सभी शामिल हैं.

अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों में दलाल की भूमिका

निजी कंपनियों के लिए ग्राहक खोजने का काम कंपनी के लिस्टेड दलाल करते हैं. इन दलालों की अहम भूमिका इसलिए भी रहती है क्योंकि ये अपनी कंपनी के मुकाबले दूसरी कंपनियों के प्रोडक्ट को घटिया और कमजोर साबित करने का काम भी करते हैं जिससे ग्राहकों से बड़ा से बड़ा ऑर्डर लिया जा सके. अतंरराष्ट्रीय स्तर पर रक्षा सामग्री खरीदने के लिए जैसे ही किसी देश से टेंडर जारी किया जाता है, रक्षा उत्पादन में लगी सभी कंपनियों अपने दलाल के जरिए उस सरकार में संपर्क साधना शुरू कर देती हैं. इसकी शुरुआत कोई भी खरीदार वैसे प्रोडक्ट बनाने वाली ज्यादातर कंपनियों से डीटेल एकत्रित कर उसकी समीक्षा करती है. जिन कंपनियो के प्रोडक्ट उनकी जरूरत के हिसाब से उचित रहते हैं उन्हें शॉर्टलिस्ट कर ट्रायल के लिए आमंत्रण दे दिया जाता है. ट्रायल में पास होने वाली सभी कंपनियों से टेंडर भरवाया जाता है और फिर सबसे कम दाम वाले और उत्कृट प्रोडक्ट को खरीदार देश मंजूरी दे देता है. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान कंपनियों के दलाल खरीदार सरकार और उनकी सेना से लगातार संपर्क में रहते हैं और यहीं उन्हें किकबैक का प्रलोभन देने का कई स्तर पर मौका मिल जाता है. गौरतलब है कि अतंरराष्ट्रीय स्तर पर सभी कंपनियां अपने दलालों के पास पर्याप्त फंड रखती है जिसका इस्तेमाल वह ऑर्डर लेने के लिए खरीदार देश में सरकार और सेना के अधिकारियों के फैसले को प्रभावित करने के लिए करते हैं. आमतौर पर यह प्रक्रिया दुनिया के ज्यादातर देशों में लीगल मानी जाती है. वहीं गैर-सैन्य सामग्री के व्यापार में भारत में भी ऐसे तरीकों का इस्तेमाल आम बात है.

भारत में दलाली रोकने की कोशिश

भारत एक लोकतांत्रिक देश है. यहां सरकार की खरीद और वह भी देश की सुरक्षा के लिए तो खास तौर पर, ऐसे अंतरराष्ट्रीय मान्यताओं को उचित नहीं ठहराया जाता. इसके चलते भारत में भी बीते दो दशको के दौरान कई बार कोशिश की गई है कि रक्षा सामग्री के दलालों को अनुमति देते हुए उन्हें रक्षा मंत्रालय से सम्बद्ध कर दिया जाए. लेकिन ऐसा किया नहीं जा सका क्योंकि किसी भी दलाल ने आगे बढ़कर खुद को रजिस्टर नहीं कराया. इसका सीधा असर देश के लिए इस क्षेत्र की खरीदारी पर पड़ा और लंबे समय तक सरकार जरूरी खरीदारी के काम को टालती रही. लेकिन केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जब नई सरकार बनी तो पहले उसने कोशिश की कि ऐसी खरीदारी का काम किसी दलाल के चैनल से करने के बजाए सीधे सरकार से किया जाए. हालांकि इस काम में भी कोई सफलता नहीं मिलती देख केन्द्र सरकार ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए देश में डिफेंस मैन्यूफैक्चरिंग को मेक इन इंडिया से जोड़ने का बड़ा कदम उठाया. अब इस कोशिश के जरिए कंपनियों से जरूरत की सामग्री खरीदने के साथ-साथ उस सामग्री का भारत में निर्माण कराने की शर्त रखी जाती है. साथ ही इस काम में देश के निजी क्षेत्र को भी भागीदारी देने की तैयारी कर ली गई है जिससे सरकार और सेना के अधिकारियों की भूमिका को कम की जा सके.

और किन मामलों में एक जैसी है बोफोर्स और ऑगेस्टा डील

बोफोर्स तोप और ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर की डील में एक बात और अहम रही है. स्वीडेन से बोफोर्स समझौते के तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का भी समझौता हुआ था लेकिन किकबैक के विवादों के चलते भारत को लगभग 2 दशकों तक इस ट्रांसफर का इंतजार करना पड़ा और नतीजा यह रहा कि हम 2015 में बोफोर्स टेक्नोलॉजी के सुधरे हुए रूप में धनुष का निर्माण कर पाए. वहीं अब इटली के साथ हुए हेलिकॉप्टर सौदे में भी भारत में इसका साझा निर्माण किया जाना था लेकिन इन विवादों ने पूरी डील पर पानी फेर दिया है. हालांकि, केन्द्र सरकार ने मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत ऑगस्टा वेस्टलैंड को शामिल करने के विकल्प पर अब काम करना शुरू किया है.

इसके अलावा एक दोनों ही सौदों में एक और बात अहम है. दोनों ही मामलों को उजागर करने में देश के बाहर से कदम उठाए गए. जहां बोफोर्स मामला रेडियो स्वीडेन के प्रसारण से रोशनी में आया वहीं ऑगेस्टा वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर का मामला इटली की कोर्ट के एक फैसले से उजागर हुआ जहां कंपनी के आला अधिकारियों पर इस डील को करने के लिए किकबैक देने की बात सामने आई.

इन दोनों ही विवादों को देखकर एक बात साफ तौर पर कही जा सकती है कि भ्रष्टाचार और घूसखोरी पर बना मुहावरा हमारे संदर्भ में महज मुहावरा नहीं रह गया है. इसके साथ हमारे देश में राजनीतिक विवादों को देश की सुरक्षा से ज्यादा तरजीह दी जाती है.

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