Politics of #Uttarakhand

उत्तराखंड के 16 साल के इतिहास में नारायण दत्त तिवारी ही एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. उनके अलावा कोई भी व्यक्ति ढ़ाई साल से ज्यादा इस प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं रह पाया. लगभग हर विधानसभा में यहां सत्ताधारी पार्टी की आंतरिक गुटबाजियों के चलते मुख्यमंत्री बदले गए. लेकिन यह गुटबाजी इस हद तक पहली बार बढ़ी है कि एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार ही अल्पमत में आ गई और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने केंद्र द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाए जाने को ‘लोकतंत्र की हत्या’ बताया है. उन्होंने केंद्र की भाजपा सरकार पर यह भी आरोप लगाए हैं कि वह किसी भी तरीके से उन राज्यों पर भी नियंत्रण चाहती है जहां गैर-भाजपा सरकारें हैं. अपनी पार्टी की गुटबाजी के लिए भी उन्होंने भाजपा को ही दोषी बताते हुए विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगाए हैं. हो सकता है कि इन आरोपों में से कुछ सही भी हों और उत्तराखंड में आए इस संकट के लिए भाजपा राजनीतिक तौर से दोषी हो. लेकिन इस पूरे प्रकरण से निपटने के लिए सत्ताधारी कांग्रेस ने जिन हथकंडों का सहारा लिया वे कानूनी और संवैधानिक तौर पर सही नहीं लगते.

2014 में मुख्यमंत्री बने हरीश रावत के खिलाफ उनकी पार्टी के भीतर ही लंबे समय से असंतोष पनप रहा था. ‘न खाता न बही, जो हरीश रावत कहे वही सही’ जैसी कहावतें कांग्रेस के भीतर से ही निकल रही थी और उन पर तानाशाही तरीके से शासन चलाने के आरोप लग रहे थे. पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और कांग्रेस के मजबूत नेता हरक सिंह रावत समेत कुछ अन्य कांग्रेस विधायकों पर यह आरोप भी लगने लगे थे कि वे किसी भी तरह से हरीश रावत को मुख्यमंत्री पद से हटाने के प्रयास कर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद भी हरीश रावत मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मजबूती से विराजमान थे. उनकी इस कुर्सी के टूटने की पहली चरमराहट 18 मार्च को विधानसभा में सुनाई दी.

इस दिन प्रदेश के बजट के विभिन्न मद पारित होने थे. कुल 22 में से 21 मद पारित हो भी चुके थे. कांग्रेस के तमाम विधायकों ने इन मदों को पारित करने के लिए अपना समर्थन दिया था. लेकिन 22वें मद के रूप में जब विनियोग विधेयक के पारित होने की बारी आई तो सदन में हंगामा शुरू हो गया. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने विनियोग विधेयक पर मतविभाजन की मांग उठाई. कांग्रेस के नौ विधायकों ने अचानक बागी तेवर अपनाते हुए नेता प्रतिपक्ष का समर्थन किया और वे भी मतविभाजन की मांग करने लगे. लेकिन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल ने इस मांग को अनसुना करते हुए ध्वनि-मत से विनियोग विधेयक के पारित होने की पुष्टि कर दी. यहीं से उत्तराखंड सरकार का बुरा वक्त शुरू हो गया.

यदि 18 मार्च को ही विनियोग विधेयक पर मतविभाजन हो गया होता तो आज उत्तराखंड पर आए संकट पर संविधान विशेषज्ञों के इतने विभाजित मत देखने को न मिलते. लेकिन ऐसा नहीं हुआ जिसके चलते कई कानूनी और संवैधानिक प्रश्न पैदा हो गए. पहला प्रश्न तो यही उठता है कि विनियोग विधेयक पर मतविभाजन की मांग को मानने के लिए विधानसभा अध्यक्ष बाध्य है या नहीं?

सुभाष कश्यप जैसे कई संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि सदन में यदि कोई अकेला विधायक भी मतविभाजन की मांग कर देता है तो विधानसभा अध्यक्ष को यह मांग पूरी करनी चाहिए. परंपरा भी यही रही है कि विधायकों द्वारा मतविभाजन की मांग को हमेशा पूरा किया जाता है. लेकिन जहां तक ऐसी किसी मांग को पूरा करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष की बाध्यता का सवाल है, तो इसका सीधा जवाब संविधान में भी नहीं मिलता. ऐसे में शायद आने वाले समय में न्यायिक व्याख्याओं के जरिये ही इस सवाल का सही जवाब मिल सके.

फिलहाल यदि मान भी लें कि मतविभाजन की मांग को मानने के लिए विधानसभा अध्यक्ष बाध्य नहीं है और वह चाहे तो ध्वनिमत से ही इस पर फैसला ले सकता है, तो भी सही फैसला लेना तो विधानसभा अध्यक्ष का कर्तव्य है ही. 18 मार्च को उत्तराखंड विधानसभा में 35 विधायकों ने विनियोग विधेयक के विरोध में हाथ उठाए थे जबकि सिर्फ 32 विधायकों ने इसके पक्ष में हाथ उठाए. कहा जा रहा है कि सदन में लगे कैमरों से भी इस तथ्य की पुष्टि हो रही है. ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष का इस विधेयक को ध्वनिमत से पारित घोषित करना सही कैसे कहा जा सकता है! इसी तथ्य से यह आरोप भी मजबूत होते हैं कि विधानसभा अध्यक्ष निष्पक्ष होकर नहीं बल्कि सरकार के इशारों पर कार्य कर रहे थे. 18 मार्च के बाद के घटनाक्रम इस आरोप को और भी ज्यादा मजबूत करते हैं.

18 मार्च को ही शाम को भाजपा के तमाम विधायक कांग्रेस के नौ बागी विधायकों के साथ राज्यपाल के पास पहुंच गए. उन्होंने राज्यपाल से विनियोग विधेयक के गिरने और इस कारण सरकार के ही अल्पमत आ जाने की बात कही और सरकार को बर्खास्त करने की मांग की. राज्यपाल ने हरीश रावत सरकार को दस दिन का समय देते हुए 28 मार्च को अपना बहुमत साबित करने के आदेश दे दिए. इसके बाद कांग्रेस से बागी हुए विधायक भाजपा नेताओं के साथ गुडगांव आ गए. उधर विधानसभा अध्यक्ष ने इन नौ विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के लिए इन्हें नोटिस जारी कर दिए. इस कदम ने कई अन्य सवाल खड़े कर दिए.

विधानसभा अध्यक्ष ने विनियोग विधेयक के पारित होने की पुष्टि की थी. इसका सीधा मतलब है कि उन्होंने माना कि सदन में सभी कांग्रेसी विधायकों ने इसके पक्ष में मतदान किया है. यदि ऐसा था तो उन्होंने किस आधार पर नौ विधायकों की सदस्यता रद्द करने का नोटिस जारी किया? और यदि वे मानते थे कि कांग्रेस के नौ विधायकों ने विनियोग विधेयक के विरुद्ध मतदान किया इसलिए उनकी सदस्यता रद्द होनी चाहिए, तो इसका मतलब वे यह भी स्वीकार कर रहे थे असल में विनियोग विधेयक पारित ही नहीं हुआ था. यानी, 18 मार्च को ही सरकार अल्पमत में आ गई थी. लेकिन विधानसभा अध्यक्ष अपने दोनों विरोधाभासी क़दमों को सही ठहराते रहे.

विनियोग विधेयक के पारित होने पर जो असमंजस 18 मार्च को बना था, वह आज भी वैसा ही बना हुआ है. ऐसा ही असमंजस कांग्रेस के नौ बागी विधायकों की सदस्यता पर भी बना हुआ है. 27 मार्च को विधानसभा अध्यक्ष ने इन सभी विधायकों की सदस्यता रद्द करने का फैसला सुना दिया था. लेकिन इस फैसले में एक कानूनी पेंच और भी है. 18 मार्च को हुए हंगामे के बाद भाजपा के तमाम विधायकों के साथ ही कांग्रेस के नौ विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव दाखिल कर दिया था. इन विधायकों ने यह प्रस्ताव उस नोटिस के जारी होने से भी पहले ही दाखिल कर दिया था जो नौ विधायकों को पार्टी व्हिप के उल्लंघन के लिए जारी किये गए थे. ऐसे में सवाल यह भी है कि जिस विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लंबित हो, क्या उसे यह अधिकार है कि वह विधायकों की सदस्यता पर फैसला ले सके.

माना जा रहा है कि विधानसभा अध्यक्ष ने 27 मार्च को इन नौ विधायकों की सदस्यता इसलिए रद्द की ताकि 28 मार्च को जब हरीश रावत अपना बहुमत सिद्ध करें तो ये विधायक उनकी राह में रोड़ा न बन सकें. इन विधायकों के निलंबन की स्थिति में सिर्फ 61 विधायकों के आधार पर ही बहुमत साबित करना होता जो हरीश रावत आसानी से कर सकते थे. लेकिन ऐसा होने से पहले ही राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. केंद्र के इस फैसले में उस स्टिंग ऑपरेशन ने भी अहम् भूमिका निभाई जो 26 मार्च को सार्वजनिक हुआ था.

इस स्टिंग में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत बागी विधायकों को वापस अपने साथ जोड़ने के लिए तमाम आपराधिक गतिविधियां करने को तैयार नज़र आए. हालांकि यह स्टिंग बागी विधायकों पर भी कई सवाल खड़े करता है. लेकिन इस स्टिंग ने केंद्र सरकार को यह मानने के पर्याप्त कारण दे दिए कि उत्तराखंड राज्य में ‘संवैधानिक संकट’ उत्पन्न हो गया है और वहां राष्ट्रपति शासन लगाना जरूरी हो चुका है.

राष्ट्रपति शासन लगने के साथ ही उत्तराखंड की सत्ता वहां के नेताओं के हाथ से निकल गई और अब राज्यपाल, केंद्र सरकार, राष्ट्रपति और न्यायालयों के बीच झूल रही है. इस सदर्भ में आज अनेकों मामले उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों में लंबित हैं. किसी मामले में विनियोग विधेयक को गलत तरीके से पारित करने को चुनौती दी गई है, किसी में गलत तरीके से विधायकों की सदस्यता रद्द करने को तो किसी में गलत तरीके से राष्ट्रपति शासन लगाने को चुनौती दी गई है.

इन तमाम पहलुओं पर आने वाले कुछ दिनों में अदालतों को फैसला सुनना है. इन फैसलों से ही उत्तराखंड का भविष्य भी तय होना है. यही तय करेंगे कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन रहेगा या नहीं, निलंबित नौ विधायकों की सदस्यता रहेगी या नहीं, हरीश रावत सरकार को बहुतमत साबित करने का मौका मिलेगा या नहीं और यदि मौका मिलेगा भी तो नौ बागी विधायक इसमें मतदान करेंगे या नहीं. परिणाम चाहे जो भी हों, यह साफ़ है कि प्रदेश की इस स्थिति के लिए कानूनी और संवैधानिक तौर पर जो जिम्मेदार हैं, वे सभी कांग्रेस के ही लोग हैं. जिनमें उत्तराखंड विधानसभा के अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल भी शामिल हैं.

अब बात करते हैं इस पूरे प्रकरण में भाजपा की भूमिका पर. उत्तराखंड की जो स्थिति 18 मार्च से बिगड़ती दिखी उसकी तैयारी भाजपा काफी पहले से कर रही थी. बताया जा रहा है कि भाजपा के कई बड़े नेता उत्तराखंड में कांग्रेसी विधायकों को तोड़ने के भरसक प्रयास कर रहे थे. 18 मार्च के दिन तो भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय उत्तराखंड विधान सभा में ही मौजूद थे. इस दिन जो हंगामा विनियोग विधेयक को लेकर विधानसभा में हुआ उसे देखने पर भी साफ़ होता है कि बागी विधायकों ने यह हंगामा किसी ‘जनहित’ में नहीं बल्कि भाजपा के इशारों पर ही किया था.

बागी विधायकों का नेतृत्व कर रहे कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत ने बयान दिया कि उन्होंने विनियोग विधेयक का विरोध इसलिए किया क्योंकि उत्तराखंड सरकार का बजट जनविरोधी था. उनका यह तर्क इसलिए गले नहीं उतरता क्योंकि जब बजट के मुख्य मद पारित हो रहे थे तो वे इसके समर्थन में मतदान कर रहे थे. विनियोग विधेयक का बजट की गुणवत्ता से कोई लेना-देना नहीं होता. ऐसे में यदि उनका विरोध बजट से था तो उन्हें विनियोग विधेयक का नहीं बल्कि इसे पहले पारित हुए मदों का विरोध करना चाहिए था. इससे साफ़ है कि वे सिर्फ सरकार गिराने के लिए ही विनियोग विधेयक का विरोध कर रहे थे.

18 मार्च के हंगामे के बाद जिस तरह से कांग्रेस के बागी विधायक भाजपा नेताओं के साथ प्रदेश से बाहर गए और जिस तरह से कैलाश विजयवर्गीय ने बयान दिया कि मौका मिलने पर भाजपा उत्तराखंड में सरकार बना सकती है, उससे भी साफ़ है कि पूरे प्रकरण की पटकथा भाजपा ने ही लिखी थी. साथ ही राष्ट्रपति शासन लगाए जाने का फैसला भी केंद्र की भाजपा सरकार ने ठीक उस दिन लिया जिसके अगले दिन हरीश रावत को बहुमत सिद्ध करने का समय राज्यपाल ने स्वयं तय किया था. यह फैसला कितना सही था और कितना गलत, यह अब न्यायलय को तय करना है. लेकिन जानकारों की मानें तो उत्तराखंड में जो भूमिका भाजपा ने निभाई है, उसका खामियाजा भाजपा को आने वाले समय में भुगतना पड़ सकता है.

This article is original of : http://satyagrah.scroll.in/

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