कड़वी हकीकत से रूबरू कराती डॉक्यूमेंट्री है ‘इंडियाज डॉटर’

निर्भया रेप कांड पर बनी डॉक्युमेंट्री ‘इडियाज डॉटर’ को लेकर संसद से सड़क तक हंगामा मचा. भारत सरकार ने देश में इसके प्रसारण तक पर बैन लगा दिया लेकिन फिर भी लोगों ने इसे यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया पर जमकर देखा है. इसकी उम्मीद से ज्यादा प्रसिद्धि का पूरा श्रेय भारत सरकार को ही जाता है. यह डॉक्यूमेंट्री महिला दिवस पर रिलीज होने वाली थी लेकिन बीबीसी ने आनन फानन में ब्रिटेन में इसे पहले ही रीलीज कर दिया. इंटरनेट के जमाने में किसी फिल्म या वीडियो को बैन करने का कोई मतलब नहीं है. उधर ब्रिटेन में भारतीय समयामुसार रात तीन बजे इसका प्रसारण हुआ और इधर सुबह होते ही भारत में लोगों ने खूब देखा. इसे देखने के बाद मुझे लगा कि हमारे देश की तल्ख हकीकत को बयान करने वाली इस बेहद ही खूबसूरत डॉक्यूमेंट्री को सबको देखना चाहिए ताकि पुरुषप्रधान समाज की सोच से हर कोई वाकिफ हो सके.

कारण ये है कि आपको इस दिन महिला सशक्‍तीकरण और महिलाओं से जुड़े हर मुद्दे पर समारोहों में तो खूब भाषण सुनने को मिलेंगे लेकिन कितने लोग उसमें इस बात को लेकर गंभीर हैं, यह कह पाना मुश्किल है. कम से कम इस डॉक्यूमेंट्री को देखकर महिलाएं अपने समाज और देश की सच्चाई से रूबरू तो हो पायीं. इसे देखकर एक बार फिर वो दर्द जी उठा जिसे लेकर लोग सड़कों पर उतरे थे. उस अंतहीन दर्द को फिर से महसूस कर पाएंगे जिसे भूलकर हम अपनी-अपनी जिॆंदगी में आगे बढ़ चुके हैं.

इस समय इस हकीकत को दिखाना बहुत ही जरूरी था. अगर ऐसा नहीं होता, तो एक बार फिर देश में निर्भया की गूंज न होती.

दुख इस बात का है कि जो सरकार यह नारा देती है “नहीं होगा नारी पर वार”, उसने ही इस पर बैन लगा दिया. यहां बात रेपिस्ट की नहीं, यहां बात निर्भया की है, उसके अस्तित्व की है, उसके सम्मान की है. ये कैसा देश है, जहां सरकार निर्भया फंड में 1000 करोड़ तो दे सकती है लेकिन उस पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री को दिखाने पर पाबंदी लगा देती है. ये नारी के साथ कैसा न्याय है?

बैन भी इसलिए क्योंकि इसमें रेपिस्ट का इंटरव्यू है. लेकिन किसी भी फिल्म या डॉक्यूमेंट्री को देखे बिना ही बैन लगाने की वजह समझ नहीं आती. रेपिस्ट के जिस बयान को लेकर इतना हंगामा हुआ, उसे जानना भी जरूरी था. उसकी बातें किसी भी मामले में समाज के बहुतेरे लोगों के बयान से अलग नहीं है. जैसा कि जावेद अख्तर ने कहा भी कि “मर्दों को पता तो चले कि वे रेपिस्ट की तरह सोचते हैं.”

इस डॉक्यूमेंट्री में अगर कुछ विवादित है, तो वह है दरिंदों के दोनों वकीलों का बयान. डॉक्यूमेंट्री में वकील एपी शर्मा बड़े ही गर्व से कहते हैं कि ‘अगर मेरी बहन या बेटी शादी के पहले ऐसे काम करती हैं तो मैं पूरे परिवार के सामने उस पर पेट्रोल डालकर जला दूंगा.’ दूसरे वकील एमएल शर्मा ने भी कहा है कि यदि लड़कियां बिना पर्याप्त सुरक्षा के बाहर जाती हैं, तो बलात्कार की ऐसी घटनाएं होनी तय हैं. रेपिस्ट मुकेश का भी बयान है, जिसमें उसका कहना है कि “शरीफ लड़कियां रात में नहीं घूमती हैं… लड़कों से ज्यादा लड़कियां रेप के लिए जिम्मेदार हैं.” मुझे कहीं से भी नहीं लगता कि वकीलों और रेपिस्ट दरिंदे के बयान में कोई फर्क है.

अब सोचने वाली बात यही है कि जिस देश में वकील का काम एक संभ्रात पेशा माना जाता है, उसी देश का वकील ऐसा सोचता हो, वहां पर महिलाओं की स्थित का अंदाजा लगाया जा सकता है. यहां हम कदम से कदम मिलाकर चलने की बात करते हैं, वहीं वकील एवं शिक्षित वर्ग इस तरह का शर्मनाक रुख रखता है. जिस सरकार ने एक रेपिस्ट की वजह से इस पर बैन लगा दिया बिना यह जाने कि इसमें क्या है क्या नहीं, उस सरकार के कानों तक क्या उस वकील की आवाज नहीं पहुंची? इस डॉक्यूमेंट्री के रिलीज होने के चार दिन बाद बार कौंसिल ऑफ इंडिया ने उन्हें नोटिस भेजा है.

गौर करने वाली एक बात यह भी है कि इसमें जेल में रेपिस्टों के मनोचिकित्सक बताते हैं, ‘जेल में कुछ ऐसे अपराधी भी हैं जो बताते हैं कि उन्होंने 200 से ज्यादा रेप किये हैं और उन्हें करीब 12 बार ही सजा हुई है. उनका यह भी कहना है कि उन्हें सिर्फ 200 याद हैं, हो सकता है कि इससे भी ज्यादा बार किये हों.’

इसे पढ़ने के बाद आपको यह बताने की जरूरत नहीं है कि किसी भी अपराधी के मन में कोई डर है. उनका सोचना तो सिर्फ यही है कि सरकार क्या कर लेगी. और सोचेंगे भी क्यों नहीं? इतने बड़े आंदोलन के बाद भी निर्भया के मां-बाप आज भी दोषी को सजा दिलाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं. जिस केस के लिए पूरा देश सड़कों पर आ गया, जब उसका ही कुछ नहीं हुआ, तो बाकियों का क्या होगा?

इसमें दरिंदो के परिवार, वकील, रेप कानून पर बनी जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी, लीला सेठ और गोपाल सुब्रमणयम का इंटरव्यू दिखाया गया है. उस पुलिस ऑफिसर ने अपना पक्ष रखा है, जिसने पहली बार निर्भया और उसके दोस्त को नग्न अवस्था में देखा था, सफदरजंग की उस डॉक्टर को जगह दी गयी है, जिसने निर्भया का इलाज किया था. इस केस की पड़ताल कर रहे पुलिस ऑफिसर और रेपिस्टों के परिवार को भी जगह दी गयी है. इसमें निर्भया के अध्यापक ने कई अनजान पक्ष को भी बताया है. जब टीचर ये कहता है ‘उसके सपने थे… बहुत सारे सपने थे… बहुत बड़े सपने थे….’ तो आपके रोंगेटे खड़े हो जाते हैं. निर्भया के मां-बाप जब उसकी छोटी-छोटी बातें को शेयर करते हैं, तो ऐसा लगता है कि कोई फिर से उस घाव को कुरेद रहा है.

British filmmaker Leslee Udwin (AP Photo)

इस डॉक्यूमेंट्री की डायरेक्टर लेसली उडविन ने महिलाओं के उस दर्द को बयां कर दिया है, जो वो कब से अपने सीने में दबाये बैठी थीं. ऐसा करने की हिमाकत आज तक कोई नहीं कर पाया. जहां पर इस हकीकत को देख कर एक बार फिर आपका दिल दहल जाएगा, वहीं इसके पीछे का सच आपको रुला देगा. विवादों के बीच यह डॉक्यूमेंट्री आपके मन में कई ऐसे सवाल छोड़ जाएगी, जिसका जवाब आपको खुद ही ढूंढना होगा.

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